नारी चेतना] मानवाधिकार: नई दषा-दिषा एवं अस्तित्व की पहचान

 

Dr. Mrs. Vrinda Sengupta

Assistant Professor Sociology, Govt. T.C.L. P.G. College, Janjgir (C.G.)

*Corresponding Author E-mail:

 

षोध सार-

नारी परिवार की जीवनदायिनी संजीवनी षक्ति है:

परिवार सामाजिक संगठन की मौलिक इकाई है यह एक ऐसी इकाई हैं जहां व्यक्ति को बहुत अधिक संतोश मिलता हैं मनुश्य जन्म लेने के बाद सर्वप्रथम परिवार के संपर्क में आता हैं परिवार के सदस्यों का नवजात षिषु पर गहरा प्रभाव पड़ता है यह व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं।    भारतीय संस्कृति में हमेषा नारी को आदर्ष एवं सम्मान की दृश्टि से देखा जा सकता हैं तथा उसे अद्र्धांगिनी की संज्ञा़  भी दी गई हैं। नारी की अस्मिता को मा, बहन, बेटी, बीबी और रखैल की कोटियों से बाहर लाकर स्वतंत्र रूप में निर्मित करने में मदद मिलेगी नारी की व्यक्ति के रूप  में अस्मिता को  स्थापित  करना  उसकी  संवेदनाओं, भावांे एवं विचारों को अभिव्यक्ति देना स्त्री साहित्य  का बुनियादी दायित्व हैं। नारी की अस्मिता, उसकी समस्याओं एवं  उसकी अनुभूतियों  की व्याख्या पुरूश संदर्भ में  करने  की  मानसिकता  से  बचना चाहिए। नारी को नारी के सामाजिक संदर्भ में विष्लेशित  करने का नजरिया  विकसित करना होगा। स्त्री और पुरूश अपनी नई  ऐतिहासिक  भूमिकाओं कें साथ एक दुसरे के सामने खड़े हैं। हमारी ग्रंथियां  इसे जटिल  अवष्य बना सकती हैं किन्तु हमारा विवेक और हमारी संवेदनषीलता एक  स्वच्छ और पारदर्षी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।

षब्द कुंजी- नारी चेतनामानवाधिकार, वर्तमान दषा-दिषा, मानवीय संवेदना।

 

प्रस्तावना-

नारी और पुरूश, दूसरे षब्दों में कहें तो नर और मादा ही सृश्टि के जीवों के निरन्तर गतिमान रहने के कारक हैं। इसमें से एक अपनी पूरी आयु तो जी सकता हैं लेकिन अपनी भावी संतति का कारक नही बन सकता हैं। दोनो के अनुपात में ज्यादा अंतर आने से वंषवृद्धि में प्रभाव पड़ता हैं। यही कारण हैं कि जब भी जनसंख्या गणना के बाद किसी की संख्या दूसरे की अपेक्षा बहुत कम पायी जाती हैं तो उन कारणों को खोजा जाता हैं कि आखिर यह अन्तर आया तो क्यों आया और उसे दुर करने के लिए समाज और सरकार प्रयास करती हैं। हमारे यहाॅं आदि देव षिव को अध्र्दनारीष्वर कहा गया हैं यानी नारी और पुरूश मिलकर ही सृश्टि के पूरक बनाते हैं। इतना सब कुछ होने के बावजूद हर समाज एवं देष में हर काल में स्थिति एक जैसी नहीं रही।

 

षारीरिक संरचना में कोमल एवं कमजो़र होने के कारण नारी पुरूशों द्वारा कई स्तरों पर षोशित एवं प्रताड़ित होती रही हैं पर नारियों ने उनका विरोध कर यह दिखाने का प्रयास भी किया हैं कि उन्हें कमजो़र समझकर पुरूश उनकी अवहेलना करता रहेगा तो उसका खामियाजा उसे भी भुगतना पड़ेगा।

 

गत वर्श महिलाओं ने ‘स्लट वाॅक: बेषर्मी मोर्चा‘ के नाम से जो आदोंलन दिल्ली में किया, उसकी चर्चा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अलग- अलग ढंग से हुई थी। उन दिनों टी. वी. चैनल्स ने भी  ‘स्ल्ट वाॅक- बेषर्मी मोर्चा‘  को जिस तरह दिखाया उसे देखकर ऐसा लगता था कि यह आंदोलन भारत के महानगर में नही बल्कि इंग्लैंड, पेरिस में हो रहा है। महिलाएं क्या पहनें क्या न पहनें उस पक्ष को लेकर महिलाओं ने ‘बेषर्मी- मोर्चा‘ निकाला था। महिलाओं का कहना था कि वे किस तरह की पोषाक पहन रही हैं इसका निर्धारण करने का हक़ पुरूशों को नहीं मिलना चाहिए। उन दिनों ‘बेषर्मी-मोर्चा‘ के आयोजक उमंग सभरवाल का कहना था कि हमारे आंदोलन का मकसद हैं कि लड़कियों को आजादी मिले। उन्हंे अपनी पसंद  के  कपड़े, काम  करने  और जीवन  साथी चूनने की आजादी होनी चाहिए। इसके आधार  पर उन्हें किसी  हिंसा का  षिकार नहीं बनाया जाना चाहिए और न ही उस हिंसा  को  न्यासंगत  ठहराने की कोषिष होनी चाहिए। महिला के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। 

 

मानवाधिकार-

सामाजिक जीवन की वे दषाएं जो मानव को समाज एवं कानून समस्त (संविधान के अनुसार) कार्यो को संपादित करने की पूर्ण स्वतंत्रता दे मानवा- धिकार कहलाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह जिस जाति, धर्म, संम्प्रदाय या लिंग का हो सम्मानजनक जीवन जीने का पूर्ण अधिकार है। आज का मानव जरूर अपने इन आदर्षो से दिग्भ्रमित हुआ हैं। इसी का परिणाम हैं कि मानवाधिकार के उल्लंधन की स्थिति भयावह होती जा रही हैं। कहा भी गया हैं,‘‘मानव ही मानव का भक्षक हैं। ‘‘ स्थिति पर अंकुष लगाने वर्तमान में मानवाधिकार संरक्षण की चर्चा वैष्विक रूप ले रही हैं।

 

संयुक्त राश्ट के मानवाधिकार के अंतराश्टीय विधेयक के अंतर्गत समानताषिक्षाधर्म, सामाजिक सुरक्षा, मानवीय अधिकार, न्याय, आत्मनिर्णय का अधिकार, उपेक्षित वर्ग के लोगो के विषेश संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक और संास्कृतिक उन्नति के अधिकार सम्मिलित हैं। 1993 वियना और 1995 पेइचिंग में हुए सम्मेलनों के बाद महिलाओं के अधिकारों को भी षामिल किया गया। महिलाओं को राश्ट्रीयक्षेत्रीय  और  अंतराश्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक, सामाजिक, संास्कृतिक एवं आर्थिक  गतिविधियों में समान रूप से भाग लेने के अधिकार प्रदान किए गए।

 

विशय का समाज षास्त्रीय महत्व:-

1. महिलाओं के चिंतक जाग्रत चेतना को दिषा देना।

2. पष्चिमी टोटल चरित्र की नकल को खत्म करना।

3. भावनात्मक आवष्यकता के महत्व को बढ़ावा देना।

4. महिला सुरक्षा के लिए कानून की आवष्यकता।

5. दृश्टिकोण में परिवर्तन ।

6. स्त्री स्वयं पहल करें।

7. निर्णय लेने की क्षमता का विकास।

8. योजनाओं का समुचित क्रियान्वयन।

9. सार्थक षिक्षा का पहल।

10. अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूकता।

11. कानूनी विसंगतियों को दूर करना।

12. आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना।

 

उद्देष्य-

1. कानून की दृश्टि से सभी महिलाओं को उनके अधिकारों

  के प्रति संरक्षण देना।

2. नारी सषक्तिकरण को बढ़ावा देना।

3. नारी अस्मिता के बचाव हेतु कानूनों को आम जनता तक पहुॅचाना।

4. नारी की गरिमा बनाये रखना।

5. सामाजिक विकास के लिए नारियों को अनिवार्य रूप से षिक्षित करना।

 

परिकल्पनाएॅं:-

1. महिलाओं प्रति हमारे नजरिये में परिवर्तन ।

2. महिलाओं की सुरक्षा व आरक्षण संबंधी सियासतों में बदलाव।

3. आज की जागरूकता की आवष्यकता।

4. महिलाओं का चिंतनषील होना।

 

अध्ययन क्षेत्र/पद्धति-

प्रस्तुत षोधपत्र जिला-जाॅजगीर चाम्पा के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के साथ जो व्यवहार होता है। उसका अध्ययन है एवं प्रमाण स्वरूप हरिभूमि 25 दिसम्बर (जॅाजगीर चाम्पा) का संस्करण के आंकड़ों का उदाहरण है।

 

ग्रामीण महिलाओं के समक्ष स्वयं जाकर एवं उनकी वर्तमान स्थिति का साक्षात्कार के माध्यम से अध्ययन ।

 

समस्या-

1. अषिक्षा (विषेशकर ग्रामीण क्षेत्रों में )

2. जन-जागरूकता का अभाव,

3. पष्चिमी सभ्यता का नकल

4 भावनात्मक लगाव का अभाव,

5. मानवीय पक्ष की संवेदना, सहयोग व संबंधों के प्रति अधिकारों में कमी।

6. आत्मसंतुश्टि/आत्मविष्वास का अभाव,

7. तकनीकी षिक्षा का अभाव,

8. स्त्रियों हाथ-पैर में बेड़ियां (विषेशकर ग्रामीण क्षेत्रों में)

9. संरक्षण आवष्यकता में अभाव,

10. रूढ़िवादिता/भागयवादिता/पर्दाप्रथा,

 

सुझाव-

1. स्त्रियों को नई दिषा प्रदान करने के लिए समुचित मार्गदर्षन मिले।

2. भारतीय नारी प्रत्येक व्यावसायिक पाठ्यक्रम में पुरूशों के साथ प्रवेष लें।

3. राज्य सरकार द्वारा आर्थिक सहायता।

4. रोजगारोंन्मुख षिक्षा के कार्यक्रम की योजना बनाना।

5. विघटनकारी परिस्थितियों से बचाव संबंधी परामर्ष।

6. अयोग्य वर से विवाह, पुर्नविवाह, पुत्र-पुत्री के पालन हेतु भेदभाव आदि अत्याचार पर जागरूकता की आवष्यकता।

7. ग्रामीण इलाकों में नारी जागरण आवष्यक।

 

निश्कर्श:-

महिलाओं की भागीदारी के अवसर तो हैं लेकिन समान अवसर प्राप्त करने हेतु उन्हें अभी संघर्शों की लंबी यात्रा करना है। सामाजिक जीवन की दषाएॅ जो मानव कों समाज एवं कानून समस्त कार्यो को संपादित करने की पूर्ण स्वतंत्रता दें। महिला-कल्याण योजनाबों की पूर्णता पर ध्यान केन्द्रित करें। पुरूश, स्त्रीयों को लेकर दोहरी मानसिकता से बचें।

 

स्त्रियों की स्थिति पर अंकुष लगाने हेतु ही वर्तमान में मानवा-

धिकार संरक्षण वैष्विक रूप लें एवं महिलाओं की सुरक्षा से ही समाज विकास कर उन्नति की ओर अग्रसर होगा। विडम्बना का विशय है कि देष में नारी सषक्तिकरण के नाम पर निरंतर छलावा हो रहा है। संसद में महिलाओं को 33: आरक्षण देने के नाम पर संकीर्ण सियासत हो रही है। महिलाओं के नेतृत्व मंें ही महिलाओं की सुरक्षा सुनिष्चित नहीं हो पा रही है। दुर्भाग्य की बात हैं कि एक महिला ही महिला के दर्द को नहीं समझ पा रही है।

 

केस स्टडी

1.      जातिवाद एवं पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था होने के कारण अपने यहां दलितों और महिलाओं की स्थिति दयनीय है। संयुक्त राश्ट्र संघ की विष्व सामाजिक स्थिति रिपोर्ट 2010 इस विशय पर चिंता व्यक्त की।

2.      वर्श 2011 में उ.प्र. में महिलाओं एवं लड़कियों के साथ बलात्कार के मामले प्रकाष में आयें।

3.      हमारे आस-पास ही हम पुरूशों को षराब पीकर महिलाओं को पीटते हुए देखते है।

 

रिफ्रेन्सेस:-

1. लावनिया, डाॅ.एम.एम., महिलाओं का समाजषास्त्र रिसर्च पब्लिकेषन जयपुर, नई दिल्ली।

2- Kumar Raj - Women’s Role in Indian Nation Movement - 2003

3. Devis .= Women’s status and social change - 1999.

4. Sengpta p, Women worker of India, P. 247

5. षर्मा पी.-भारतीय समाज में नारी -2001

 

 

Received on 15.11.2013       Modified on 12.12.2013

Accepted on 30.12.2013      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences 1(2): Oct. - Dec. 2013; Page 58-60